पक्ष
केहि विधि रचो नारी जग माहि
पराधीन सपनेहु सुख नही
सदियों से नारी ने दस्ताकी जिंदगी जी है । बचपन में पिता के अधीन रहना पड़ा ,तो युवा -अवस्था में पति के अधीन व् वृदा-अवस्था में पुत्र के अधीन। यह दासता उसे आर्थिक रूप से निर्भर न होने के कारन भोगनी पड़ी । इतनी लम्बी गुलामी तो किसी गुलाम ने भी नही सही होगी। आज २१ वि शताब्दी में जाकर नारी ने स्वतंत्रता की साँस ली है। वह आर्थिक रूप से स्वतंत्र हुई है। उसकी इस स्वतंत्रता से न सिर्फ़ उसे सुख मिला है बल्कि सम्पूर्ण परिवार सुख का अनुभव कर रहा है। बच्चे अपनी मनमानी कर सकते है तो बुजुर्ग भी आराम की जिंदगी जी रहे है।
स्त्री में भगवान् ने धर्य, त्याग का भाव इतना भरा है की उसने कभी अपने सुख का ध्यान नही रखा जितना परिवार का । परिवार का सुख ही उसका अपना सुख है। आर्थिक रूप से संपन माँ ही बच्चो के अरमानो को पुरा करती है। परिवार के लिए सुख का साधन जुटती है । तो साथ ही पति को आर्थिक भागीदारी करके परिवार के भोझ को धोंने में सहायक होती है
शुरू में कुछ शेत्रों में ही महिलाये कार्य कर रही थी लेकिन आज कोई भी शेत्र ऐसा नही है जिसमे नारी ने अपनी योग्यता से अपना सिक्का न जमाया हो। आज वह शिक्षा, चिकित्सा, विज्ञानं तकनिकी में ही नही , सेना , वायु सेना गोताखोर भी है। तो अन्तरिक्ष में भी अपने कदम रख चुकी है।
नारी देखने में जितनी कोमल होती है उतनी ही उसकी मानसिक शक्ति अधिक होती है। वह पति के साथ चलने में गर्व महसूस करती है। बच्चो के पालन पोषण को भी वह गर्व से करती है। सम्पूर्ण सृष्टि को ममता और प्यार का पाठ पदाने वाली नारी ने हथियार उठाने से भी परहेज नही किया । व्यवसाय के शेत्र में जहाँ भी उन्होंने कदम रखा उसे प्यार , स्नेह , शालीनता और स्वछता से मंडित कर दिया है।
आज लोग वहां काम करना पसंद करते है जहाँ की मुख्या-प्रबंधक महिला हो। ऐसे स्थान पर व्यवस्था तो अच्छी होती ही है और उसमे नारी जनित प्यार और स्नेह की गरिमा भी होती है। नारी विभिन् शेत्रों में कार्य कर रही है लेकिन उसका प्रिय शेत्र परिवार ही है जहाँ वह वात्सल्य से ,प्यार से, ममता से परिवार को सींचती है। जब कभी आर्थिक तंगी होती है तब जितनी तड़प , जितना दर्द नारी को होता है उतना किसी को नही होता । खुशी की बात यह है की वह आर्थिक दृष्टि से समर्थ है । नौकरी करके वह इतनी समर्थ हो गई है की परिवार को आर्थिक तंगी से बचा लेती है। इससे उसका आत्म-विश्वास बढता है। और समाज में सम्मान मिलता है। समाज ने उसकी योग्यता से लाभ उठाया है। इससे समाज और राष्ट्र का उत्थान हुआ है.
कोई भी परिवार तभी आधुनिक समय में सुख और सम्पनता से रह सकता है जब पति पत्नी दोनों कार्य करते हो। बदती मंहगाई और भौतिकवाद की बदती मार में आज नौकरी करना अनिवार्य हो गया है। समर्थ नारी ही आगे बाद सकती है और समाज को आगे बड़ा सकती है। और परिवार को आगे बड़ा सकती है.
आधुनिक समय में महिलाओं के प्रति होने वाले अत्याचारों ने हिला कर रख दिया है। कही दहेज़ के लिए उन्हें जलाया जाता है तो कही बच्चे न होने पर घर से निकाल दिया जाता है। कही मार-पीट कर घायल कर दिया जाता है। तो कही उसे मानसिक यातनाएँ देकर उसे आहात किया जाता है। ऐसे हालातो में नारी नौकरी नही करेगी तो उसका जीवन नरक बन जाएगा । वह डर- डर ठोकरे खाने के लिए मजबूर हो जायेगी । अततः में यह कहना चाहूंगी की आज के युग में नौकरी करना नारी के लिए अनिवार्य है। इससे परिवार संभलता है बिगड़ता नही।
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