पक्ष
‘कह रहा यह सांध्य रवि ढलता हुआ,
यो सदा चढ़ कर उतरना है अटल ,
फुल चढ़ तस के शिखर पर हंस दिया ,
अंत में तो धुल का आँचल मृदुल.’
सम्पूर्ण जगत इस बात से परिचित है की जन्म , विकास और मृत्यु शाश्वत है , अटल है , लेकिन इस शाश्वता में तीव्रता तब और भी ज्यादा आ जाती है जब विकास और उन्नति की गति तेज हो जाती है . जितनी तीव्र गति से चलेंगे उतनी ही जल्दी मंजिल को प्राप्त करेंगे-------. मंजिल प्राप्त होने पर मनुष्यों के विचारों में परिवर्तन आता है . यह परिवर्तन दो परकार का होता है . १-इस भोतिक शरीर को भोतिक साधनों से सुख पहुचाने की लालसा और २-आदमी की चेतना को बदलने की लालसा. विज्ञानं मनुष्यों के सुख –साधनों पर ध्यान देता है तो धरम मनुष्य की चेतना पर . विज्ञान तीव्र गति से उन्नति करता है जिसका सहारा मानव जाती ने लिया है . वेह तीव्र गति से विजय की और बढता है और विजय के उन्माद से भोग-विलास की और मुड़ता है . नैतिकता और मानवीय मूल्यों से गिर जाता है . और यही से उसका पतन प्ररुम्भ हो जाता है .
गाँधी –जी ने कहा -भोग और विलास से सृजन नही होता , टाप –त्याग के साथ ही सृजन का रिश्ता है . भोग –विलास का रास्ता तो पतन की मंजिल तक पहुचने के लिए अभी शप्त है .
रोम और उनां का विकास जिस तीव्र गति से हुआ उतनी ही तीव्र गति से विनाश हुआ . इस तीव्रता में एक अवगुण यह भी नज़र आता है की तीव्रता में सोच की, उसके दुश-पर्भावो को न समझ पाने की , सावधानियों की कमी रह जाती है . कहा गया है की –‘जल्दी का काम जिन् का ‘ अर्थात उसमे गहन चिंतन की कमी होती है. इसलिए तीव्र गति से किया गया विकास जल्दी ही विनाश के कगार पर पहुँच जाता है .
ताश के पत्तो का महल जितना जल्दी बनता है लेकिन उसकी स्थिरता शंका –जनित होती है . कछुआ और खरगोश की कहानी भी यही शिक्षा देती है. जल्दी से किए गए कामो से थकान और तृतीय बदती है. यही विनाश का कारन बनती है . धीरे –धीरे किए गए कार्यो में स्थायित्व और समझ –दारी होती है. उनमे आई कमियों को , विनाश की शंकाओ को दूर किया जा सकता है . जिससे स्थायित्व मिलता है .
जब-जब मानवजाति ने तीव्र गति से उन्नति की तब-तब विनाश की और उन्मुख हुए.
इतिहास में झाँक कर देखे तो ऐसे हजारो उद्धरण सामने है. बोध-धरम को लोगो ने जिस तेजी से और उदारता से अपनाया है बाद में उसी को महायान के लोगो ने भोग-विलासिता में पड़ कर उसको घ्रिदित रूप दे दिया . संसार में माक्स-सरवाड़ जिस तेजी से फैला उसका हास हम रूस के विघटन के रूप में देख सकते है
कासिवाद और नाजिबाद ने एक समय विश्व में तहलका मचा दिया लेकिन उसका अंत किसी से छुपा नही . मात्र २५-३० वर्षो में करोरो मानवो को अमानवीयता से समाप्त कर स्वयम संसार से तिरोहित हो गया . ऐसे अनेक प्रत्यक्ष पर्मानो से इतिहास भरा हुआ है की तीव्र गति से की गई उन्नति से न सिर्फ़ पतन होता है बल्कि विनाश भी होता है.
‘कह रहा यह सांध्य रवि ढलता हुआ,
यो सदा चढ़ कर उतरना है अटल ,
फुल चढ़ तस के शिखर पर हंस दिया ,
अंत में तो धुल का आँचल मृदुल.’
सम्पूर्ण जगत इस बात से परिचित है की जन्म , विकास और मृत्यु शाश्वत है , अटल है , लेकिन इस शाश्वता में तीव्रता तब और भी ज्यादा आ जाती है जब विकास और उन्नति की गति तेज हो जाती है . जितनी तीव्र गति से चलेंगे उतनी ही जल्दी मंजिल को प्राप्त करेंगे-------. मंजिल प्राप्त होने पर मनुष्यों के विचारों में परिवर्तन आता है . यह परिवर्तन दो परकार का होता है . १-इस भोतिक शरीर को भोतिक साधनों से सुख पहुचाने की लालसा और २-आदमी की चेतना को बदलने की लालसा. विज्ञानं मनुष्यों के सुख –साधनों पर ध्यान देता है तो धरम मनुष्य की चेतना पर . विज्ञान तीव्र गति से उन्नति करता है जिसका सहारा मानव जाती ने लिया है . वेह तीव्र गति से विजय की और बढता है और विजय के उन्माद से भोग-विलास की और मुड़ता है . नैतिकता और मानवीय मूल्यों से गिर जाता है . और यही से उसका पतन प्ररुम्भ हो जाता है .
गाँधी –जी ने कहा -भोग और विलास से सृजन नही होता , टाप –त्याग के साथ ही सृजन का रिश्ता है . भोग –विलास का रास्ता तो पतन की मंजिल तक पहुचने के लिए अभी शप्त है .
रोम और उनां का विकास जिस तीव्र गति से हुआ उतनी ही तीव्र गति से विनाश हुआ . इस तीव्रता में एक अवगुण यह भी नज़र आता है की तीव्रता में सोच की, उसके दुश-पर्भावो को न समझ पाने की , सावधानियों की कमी रह जाती है . कहा गया है की –‘जल्दी का काम जिन् का ‘ अर्थात उसमे गहन चिंतन की कमी होती है. इसलिए तीव्र गति से किया गया विकास जल्दी ही विनाश के कगार पर पहुँच जाता है .
ताश के पत्तो का महल जितना जल्दी बनता है लेकिन उसकी स्थिरता शंका –जनित होती है . कछुआ और खरगोश की कहानी भी यही शिक्षा देती है. जल्दी से किए गए कामो से थकान और तृतीय बदती है. यही विनाश का कारन बनती है . धीरे –धीरे किए गए कार्यो में स्थायित्व और समझ –दारी होती है. उनमे आई कमियों को , विनाश की शंकाओ को दूर किया जा सकता है . जिससे स्थायित्व मिलता है .
जब-जब मानवजाति ने तीव्र गति से उन्नति की तब-तब विनाश की और उन्मुख हुए.
इतिहास में झाँक कर देखे तो ऐसे हजारो उद्धरण सामने है. बोध-धरम को लोगो ने जिस तेजी से और उदारता से अपनाया है बाद में उसी को महायान के लोगो ने भोग-विलासिता में पड़ कर उसको घ्रिदित रूप दे दिया . संसार में माक्स-सरवाड़ जिस तेजी से फैला उसका हास हम रूस के विघटन के रूप में देख सकते है
कासिवाद और नाजिबाद ने एक समय विश्व में तहलका मचा दिया लेकिन उसका अंत किसी से छुपा नही . मात्र २५-३० वर्षो में करोरो मानवो को अमानवीयता से समाप्त कर स्वयम संसार से तिरोहित हो गया . ऐसे अनेक प्रत्यक्ष पर्मानो से इतिहास भरा हुआ है की तीव्र गति से की गई उन्नति से न सिर्फ़ पतन होता है बल्कि विनाश भी होता है.