Tuesday, July 28, 2009

मानव जाती की तीव्र गति से उन्नति ही उसके विनाश का कारन है.

पक्ष

कह रहा यह सांध्य रवि ढलता हुआ,
यो सदा चढ़ कर उतरना है अटल ,
फुल चढ़ तस के शिखर पर हंस दिया ,
अंत में तो धुल का आँचल मृदुल.’

सम्पूर्ण जगत इस बात से परिचित है की जन्म , विकास और मृत्यु शाश्वत है , अटल है , लेकिन इस शाश्वता में तीव्रता तब और भी ज्यादा जाती है जब विकास और उन्नति की गति तेज हो जाती है . जितनी तीव्र गति से चलेंगे उतनी ही जल्दी मंजिल को प्राप्त करेंगे-------. मंजिल प्राप्त होने पर मनुष्यों के विचारों में परिवर्तन आता है . यह परिवर्तन दो परकार का होता है . -इस भोतिक शरीर को भोतिक साधनों से सुख पहुचाने की लालसा और -आदमी की चेतना को बदलने की लालसा. विज्ञानं मनुष्यों के सुखसाधनों पर ध्यान देता है तो धरम मनुष्य की चेतना पर . विज्ञान तीव्र गति से उन्नति करता है जिसका सहारा मानव जाती ने लिया है . वेह तीव्र गति से विजय की और बढता है और विजय के उन्माद से भोग-विलास की और मुड़ता है . नैतिकता और मानवीय मूल्यों से गिर जाता है . और यही से उसका पतन प्ररुम्भ हो जाता है .

गाँधीजी ने कहा -भोग और विलास से सृजन नही होता , टापत्याग के साथ ही सृजन का रिश्ता है . भोगविलास का रास्ता तो पतन की मंजिल तक पहुचने के लिए अभी शप्त है .

रोम और उनां का विकास जिस तीव्र गति से हुआ उतनी ही तीव्र गति से विनाश हुआ . इस तीव्रता में एक अवगुण यह भी नज़र आता है की तीव्रता में सोच की, उसके दुश-पर्भावो को समझ पाने की , सावधानियों की कमी रह जाती है . कहा गया है की –‘जल्दी का काम जिन् काअर्थात उसमे गहन चिंतन की कमी होती है. इसलिए तीव्र गति से किया गया विकास जल्दी ही विनाश के कगार पर पहुँच जाता है .

ताश के पत्तो का महल जितना जल्दी बनता है लेकिन उसकी स्थिरता शंकाजनित होती है . कछुआ और खरगोश की कहानी भी यही शिक्षा देती है. जल्दी से किए गए कामो से थकान और तृतीय बदती है. यही विनाश का कारन बनती है . धीरेधीरे किए गए कार्यो में स्थायित्व और समझदारी होती है. उनमे आई कमियों को , विनाश की शंकाओ को दूर किया जा सकता है . जिससे स्थायित्व मिलता है .

जब-जब मानवजाति ने तीव्र गति से उन्नति की तब-तब विनाश की और उन्मुख हुए.

इतिहास में झाँक कर देखे तो ऐसे हजारो उद्धरण सामने है. बोध-धरम को लोगो ने जिस तेजी से और उदारता से अपनाया है बाद में उसी को महायान के लोगो ने भोग-विलासिता में पड़ कर उसको घ्रिदित रूप दे दिया . संसार में माक्स-सरवाड़ जिस तेजी से फैला उसका हास हम रूस के विघटन के रूप में देख सकते है

कासिवाद और नाजिबाद ने एक समय विश्व में तहलका मचा दिया लेकिन उसका अंत किसी से छुपा नही . मात्र २५-३० वर्षो में करोरो मानवो को अमानवीयता से समाप्त कर स्वयम संसार से तिरोहित हो गया . ऐसे अनेक प्रत्यक्ष पर्मानो से इतिहास भरा हुआ है की तीव्र गति से की गई उन्नति से सिर्फ़ पतन होता है बल्कि विनाश भी होता है.

Thursday, July 16, 2009

युवा -अवस्था -विपक्ष

को




कौन कहता है की युवावस्था फूलो भरी है ? यह तो कुछ कुंठित लोगो की शरारत जान पड़ती है आज के युवा वर्ग का जीवन फूलो से भरा नही है वह तो प्रयोगों से भरा है उत्साह , उमंग और आशाओ से भरी जिंदगी में वह सब कुछ भोग लेना चाहता हैं जीवन को अपने ढंग से जीने की लालसा किसमे नही होती है जीवन उसका अपना वह जैसे चाहे वैसे जिए इसके लिए वह संघर्ष भी करता है


आज का युवा-वर्ग पहले से कही ज्यादा समझदार और यथार्थवादी है वह आदर्शो के खान्दर में नही यथार्थ की जमीन पर जीना चाहता है वह ऊँगली पकड़ कर चलने वाला बालक नही हाथ पकड़ कर सहारा देने वाला युवक है जो स्वयम नही जियेगा वह दुसरो को सहारा क्या देगा ? वह स्वयम अपने साहस से ऐसा रास्ता चुनता हैं जहाँ फुल होते हैं, कांटे नही अपने जीवन के विभिन् अनुभवों से सीखता हुआ वह आगे बढता हैं वह किसी के बताये रास्ते पर चल कर स्वयम अपना रास्ता चुनता है जब यही युवा अपनी प्रोदावस्था में पहुँचता हैं तो यह संघर्षो का नही जीवन की विभिन् चुनोतियों का का सामना करता है एपी जिसने जीवन का वृद ऐसे है करता प्रयत्न जिसे वह लाख परेशानियों के बाद भी पाने का प्रयत्न करता है. ऐसे वृद का जीवन जिसने अपनी इच्छा अनुसार जिया हो वह कीनही करता हो मानते जीवन सिधांत के ले सुधि होता


समाज को ऐसे बुजुर्गो को पुरस्कृत करना चाहिए जो वृदावस्था को उलास से भरते है . ऐसा वाही व्यक्ति कर सकते है जोकिया सो गया आगे की सुधि लेके सिधांत को मानते हो.

आज के युवक को साम-दाम , दुंद-भेद सभी नीतियों का ज्ञान है यही कारन है की वेह कही मात नही खता . निति , धरम , निष्ठां जैसे मोधारे हथियारों का वेह सहारा नही लेता इसलिए वेह संघर्ष करता है और ही और पश्चाताप . मनुष्य को समय के साथ चलना चाहिए . नही तो समय उसे पीछे छोड़ जाएगा.

आज का युवा वर्ग भगवान्कृष्ण के वचनों का पालन करता नज़र आता है . ‘ कर्मण्ये वान्धिकारास्तु माँ फलेषु कदाचनःवेह फल की इच्छा नही करता . जो मिलता है उसे अपनी भुदी से , बल से अपने अनुकूल बना लेता है . और जब अनुकूल बना लिया तो पश्चाताप ही कैसा ? फ़िर तो आनंद है परम आनंद.

आज का वृद परलोक की चिंता नही करता बल्कि इस लोक में मरते दम तक सक्रीय भूमिका अदा करता नज़र आता है . वह ज्ञान और अनुभवों का अपार भण्डार होता है . उसे पश्चाताप कैसा ? वह तो समाज की अमूल्यनिधि होता है . शान्ति और संतोष का साकार रूप होता है . पश्चाताप होता है उन्हें जो इन्हे पहचान नही पाते.