पक्ष
‘ मेरा जुटा है जापानी ये पतलून एन्ग्लिश्स्तानी ,
सर पे लाल टोपी रुसी , फ़िर भी दिल है हिन्दुस्तानी’
मेरा मतलब है की विदेश में बसने से कोई भी व्यक्ति देश-द्रोही नही हो जाता . उसका दिल तो हमेशा देश के लिए धड़कता है . और वह आजीवन उसकी प्रगति की कामना करता हैं. विदेश में बस जन , अपने सपनो को साकार करने के लिए अवशक है . , जो उचित ही नही सरहनीय है.
प्लेटो , अरस्तु , ताल्स्तॉय, मेंकैवर , आदि विश्व के व्यक्ति है . इन्हे सीमओं में नही बाँधा नही जा सकता . सूरदास, कबीर, तुलसी , जायसी आदि आज विश्व में छाये हुआ है . इनकी प्रतिभा किसी की धरोहर नही . भारतीय अपनी प्रतिभा के बल पर विश्व में छाये हुआ है
हमारे देश के ना जाने कितने लोग विदेश में बस कर हमारे देश का नाम रोशन कर रहे हैं. हमारे परधन-मंत्री ने परवासी भारतीयों से अपने देश में धन लगाने की इच्छा व्यक्त की है . ये विदेशी धन को भारत में लेन का एक सरल और अच्छा पर्योग है.
प्रोफ़ेसर . लक्ष्मी मित्तल अपनी म्हणत से विदेश में बस कर भारत के ‘बिल्गातेस’ बन गए.
भारत की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारन लोग विदेश जाते हैं. वे अपनी आर्थिक स्थिति के साथ-साथ सामाजिक स्थिति को भी उचा कर लेते हैं. वे विदेश क्यो न जाए? वहां कामयाबी उनके कदम चूमती हैं. क्यो उन्हें गरीबो और बेरोजगारी की जिंदगी जिन्नी चाहिए जबकि विदेश में कामयाब होने के अनेक अवसर होते हैं.
भारत की बेरोजगारी का कोई अंत नही हैं . शिक्षा के शेत्र में भी आरक्षण है . व्यवसाय के और नौकरियों के शेत्र में आरक्षण की समस्या ने पड़े लिखे लोगो को विदेश जाने के लिए मजबूर भी किया हैं. क्योकि अपने देश में हालत कुछ ऐसे हैं-
“ कभी घोडो को भी नही मिलती घांस”
कभी गधे भी खाते हैं चवनप्राश”
भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद से आज हालत ये हैं की यहाँ रिश्वतखोर और भ्रष्ट लोग ही कामयाब होते हैं. हमारे यहाँ प्रतिभा का सम्मान नही होता . हर प्रतिभावान व्यक्ति की पहचान विदेश में जाकर हो गई हैं. कल्पना चावला अगर भारत में होती तो अन्तरिक्ष की उच्चायिया कभी नही नाप पाती . क.व्. रमन जी को नोबल प्रिज़े विदेश जाने पर मिला . यहाँ तक की मोहनदास करमचंद जी को पहचान भी अफ्रीका जाकर मिली.
ऐसा कौन सा व्यक्ति होगा जो अपनी प्रतिभा को और व्यक्तित्व को निखारने का मौका छोड़कर गरीबी में जिंदगी जीना चाहेगा.
आज प्रतिभा पल्याँ की समस्या एक विकराल समस्या बनती जा रही हैं. इसका मुख्य कारन यह है की यहाँ प्रतिभावान व्यक्तियों के विकास के उचित साधन उपलब्ध नही हैं. लोगो में प्रतिभा हैं , कुछ कर गुजरने की भावना है. तो वे विदेश क्यो ना जाए .
विदेश में बसने से उनके व्यक्तित्व की पहचान होती हैं. धन –yash सभी कुछ मिलता हैं… तो लोगो को ऐतराज़ क्यो? हर व्यक्ति जीवन में उचायियन चुना चाहता हैं. महँ कार्यो से जीवन को सार्थक करना चाहता हैं तो देश को दुहाई देकर उनकी उड़ान को रोकने का अधिकार किसी को नहीं.
ख्वाब देखना युवाओ का कार्य हैं., धर्मं हैं. उन्हें साकार करने में ही उनके जीवन की सार्थकता हैं. तो ख्वाब देखिये और उन्हें सुच करने की कोशिश कीजिये..
‘ मेरा जुटा है जापानी ये पतलून एन्ग्लिश्स्तानी ,
सर पे लाल टोपी रुसी , फ़िर भी दिल है हिन्दुस्तानी’
मेरा मतलब है की विदेश में बसने से कोई भी व्यक्ति देश-द्रोही नही हो जाता . उसका दिल तो हमेशा देश के लिए धड़कता है . और वह आजीवन उसकी प्रगति की कामना करता हैं. विदेश में बस जन , अपने सपनो को साकार करने के लिए अवशक है . , जो उचित ही नही सरहनीय है.
प्लेटो , अरस्तु , ताल्स्तॉय, मेंकैवर , आदि विश्व के व्यक्ति है . इन्हे सीमओं में नही बाँधा नही जा सकता . सूरदास, कबीर, तुलसी , जायसी आदि आज विश्व में छाये हुआ है . इनकी प्रतिभा किसी की धरोहर नही . भारतीय अपनी प्रतिभा के बल पर विश्व में छाये हुआ है
हमारे देश के ना जाने कितने लोग विदेश में बस कर हमारे देश का नाम रोशन कर रहे हैं. हमारे परधन-मंत्री ने परवासी भारतीयों से अपने देश में धन लगाने की इच्छा व्यक्त की है . ये विदेशी धन को भारत में लेन का एक सरल और अच्छा पर्योग है.
प्रोफ़ेसर . लक्ष्मी मित्तल अपनी म्हणत से विदेश में बस कर भारत के ‘बिल्गातेस’ बन गए.
भारत की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारन लोग विदेश जाते हैं. वे अपनी आर्थिक स्थिति के साथ-साथ सामाजिक स्थिति को भी उचा कर लेते हैं. वे विदेश क्यो न जाए? वहां कामयाबी उनके कदम चूमती हैं. क्यो उन्हें गरीबो और बेरोजगारी की जिंदगी जिन्नी चाहिए जबकि विदेश में कामयाब होने के अनेक अवसर होते हैं.
भारत की बेरोजगारी का कोई अंत नही हैं . शिक्षा के शेत्र में भी आरक्षण है . व्यवसाय के और नौकरियों के शेत्र में आरक्षण की समस्या ने पड़े लिखे लोगो को विदेश जाने के लिए मजबूर भी किया हैं. क्योकि अपने देश में हालत कुछ ऐसे हैं-
“ कभी घोडो को भी नही मिलती घांस”
कभी गधे भी खाते हैं चवनप्राश”
भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद से आज हालत ये हैं की यहाँ रिश्वतखोर और भ्रष्ट लोग ही कामयाब होते हैं. हमारे यहाँ प्रतिभा का सम्मान नही होता . हर प्रतिभावान व्यक्ति की पहचान विदेश में जाकर हो गई हैं. कल्पना चावला अगर भारत में होती तो अन्तरिक्ष की उच्चायिया कभी नही नाप पाती . क.व्. रमन जी को नोबल प्रिज़े विदेश जाने पर मिला . यहाँ तक की मोहनदास करमचंद जी को पहचान भी अफ्रीका जाकर मिली.
ऐसा कौन सा व्यक्ति होगा जो अपनी प्रतिभा को और व्यक्तित्व को निखारने का मौका छोड़कर गरीबी में जिंदगी जीना चाहेगा.
आज प्रतिभा पल्याँ की समस्या एक विकराल समस्या बनती जा रही हैं. इसका मुख्य कारन यह है की यहाँ प्रतिभावान व्यक्तियों के विकास के उचित साधन उपलब्ध नही हैं. लोगो में प्रतिभा हैं , कुछ कर गुजरने की भावना है. तो वे विदेश क्यो ना जाए .
विदेश में बसने से उनके व्यक्तित्व की पहचान होती हैं. धन –yash सभी कुछ मिलता हैं… तो लोगो को ऐतराज़ क्यो? हर व्यक्ति जीवन में उचायियन चुना चाहता हैं. महँ कार्यो से जीवन को सार्थक करना चाहता हैं तो देश को दुहाई देकर उनकी उड़ान को रोकने का अधिकार किसी को नहीं.
ख्वाब देखना युवाओ का कार्य हैं., धर्मं हैं. उन्हें साकार करने में ही उनके जीवन की सार्थकता हैं. तो ख्वाब देखिये और उन्हें सुच करने की कोशिश कीजिये..
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