Monday, August 17, 2009

फास्ट-फ़ूड -विपक्ष

विपक्ष

" बदले-बदले से आसार नज़र आते है ,

अब तो जगह-जगह मुझे फास्ट-फ़ूड खाते ,

बीमार नज़र आते है। "

ये फास्ट फ़ूडइन्होने तो हमारी जीवन शैली को ही बदल डाला हैबदल क्या , नष्ट ही कर डाला हैभारतीय खान -पान की शैली को पथ-भ्रष्ट ही कर डाला हैदूर कर दिया है युवाओ को ममता की ठंडी छाओ से


कहते है की दिलो के रास्ते पेट से होकर जाते हैमाँ बच्चे को दुलारती है , पुचकारती है , तब उसे अपने हाथो से बना स्वादिष्ट, स्वछ मखन वाला परांठा खिलाती हैपरन्तु अब बच्चा मांगता है मैगी जिसमे सिवाय मैदा के और मसालों के कुछ नहीभला पैकेट में बंद चीजों में माँ की ममता कैसे समाएगी


हमारा देश कृष्ण भगवन का देश हैजहाँ उन्हें माखन-चोर भी कहा जाता हैवह मटकी से माखन और दही चुरा-चुरा कर खाते थे परन्तु अब कृष्ण की धरती पर बच्चे खा रहे है -पिज्जा, बर्गर, नुडल्सये कैसी जीवन -शैली हैजहाँ आराम से बैठकर खाने का समय नही हैपहले ज़माने में पुरा परिवार बैठ कर आराम से भोजन खता थाजिससे उनका आपसी प्रेम बढता था


परन्तु आज फास्ट-फ़ूड के कारन युवा पीडी घर का खाना खाने से कतराती हैऔर कामकाजी पुरूष और महिलाये भी हल्का-फुल्का खाक-कर चले जाते है और फ़िर कैंटीन में खाते है फास्ट-फ़ूड


हाँ | जीवन तो आसन हो गया है क्योकि रसोई घर में कम समय देना पड़ता हैपरन्तु मेरे मित्रपूर्वी और पच्छिमी सभ्यता का संस्कारी अन्तर यदि अधिक है तो वह हमारी रसोई और भोजन -शैली के कारनभारतीय परिवार रसोई घर को मन्दिर मानते हैउसके स्वाद और पेट को तृप्ति घर के भोजन से ही मिलती है


फास्ट-फ़ूड से नुक्सान भी झेलने पड़ते हैजरुरु नही की बहार का खाना हमेशा साफ़ ही होऐसा होने पर पेट ख़राब हो जाता हैबासी खाना खाने पर फ़ूड-पोइसिनिंग हो जाती है अर्थात खाना विष- वाट हो जाता हैजितने का खाना नही होता उससे ज्यादा डॉक्टर को देना पड़ता हैऔर जान के लाले पड़ जाते है वो अलगहमारा देश तो विभिन् प्रांतीय -पकवानों का देश हैयहाँ विभिन् परकार के व्यंजन बनते हैहमें अपने देश को फास्ट-फ़ूड का गुलाम होने से बचाना हैक्योकि पेट और जिव्यहा आपसी शत्रु हैजीभ सिर्फ़ स्वाद मांगती है और पेट तृप्तिस्वाद लालची है और तृप्ति मोक्ष लालच को छोड़ो और तृष्णा को अन्न के अमृत से तृप्त करो

यह समझो और समझाओ ,

फास्ट -फ़ूड से ख़ुद को बचाओ,

दाल-रोटी खाओ ,

प्रभु के गुन गाओ .

फास्ट फ़ूड ने जीवन शैली को आसान बना दिया है- पक्ष

पक्ष

कम फास्ट -----------------गो फास्ट ------------------दो फास्ट ---
आज की जीवन शैली ही यही हैसब कुछ फास्टइस भागम-भाग की जिंदगी को यदि किसी ने आसान किया है तो वह है फास्टफ़ूड अर्थात जल्दी तैयार हो जाने वाला भोजनभोजन भी वह जो तज्जा हो , स्वादिष्ट हो , और स्वास्थ्यवर्धक भी होहा वेह , यही है आज आसन फास्ट- फ़ूड जिसने हमारी जिंदगी को सुकून दिया हैअन्यथा भूखे रहकर कब का युवावर्ग अन्तिम साँसे गिन रहा होता

आज कंप्यूटर का युग हैहर कार्य भी उसी गति से हो रहा हैसच मानिए आज किसको फुर्सत है जो आज खाना भी कोई आराम से खा सकेबनाने की तो कौन सोचेसुबह उठकर ज़रा बहार झाँक कर तो देखिये ------सूर्य की किरनों के आगमन से पूर्व ही लोग बसों के इन्तिज़ार में खड़े होते हैंबच्चे स्कूल बैग लिए बस के इन्तिज़ार में निंदी आंखों से हाथ में पकड़ा सैंड -विच खातेA नज़र आएंगेसैंड-विच जायेंगे . क्या करे . संद्वित्च , बेर्गेर, मग्गी आदि खाद्य पदार्थो ने ही तो उन्हें सहारा दिया हैआज किस माँ को इतनी फुर्सत है की जो सुबह उठकर परांठे भी बनाए और स्वयम भी काम पर निकलेवह भी काल प्रथ कोई कोण नहीऔर-----बन्नने तो जानते ही है की स्वास्थ्य के लिए परांठे कितने अस्वस्थ्य- करक है . वजन भी बढाते है और बीमारियों को भी आमंत्रण भी देते है. ऐसे में एक ही सहारा है फास्टफ़ूड .

यथानाम तथो गुनह . फास्ट फ़ूड यानी जल्दी तैयार होने वाला , जल्दी खाया जाने वाला खाद्य पदार्थ . जो कही भी , कभी भी , कैसे भी खाया जा सकता है . प्लेट की जरुरत है , कटोरी की और ही चमच की . एक पेपर नैपकिन ही पर्याप्त है उसे रखने और खाने के लिए . कितना अच्छा है यह भोजन हाथ गंदे कपड़े गंदे .

में आज की याद करता हु . वो दिन जब दाल चावल या सब्जी-रोटी खाते वक्त कुछ कुछ गिर ही जाता था . कपड़े पीले , हाथ पीले, यहाँ तक की उसका असर कॉपी और किताब पर ही दिखाए देने लगता . और फ़िर माँ के क्रोध का असर मुझ पर------. समझ ही गए होंगे आप ---------की कितनी मुसीबत थी खाना बनाना और कही भी ले जाना .

फास्टफ़ूड ने हमारी दिनचर्या को फास्ट बना दिया है . बस यु समझो कीचाट मंगनी, पट शादी ‘.अर्थात थोड़े समय में ही भोजन का पूर्ण आनंद लीजिये. झटपट बनाइये और मनचाहे तब खाइए . बनाना की भी जरुरत नही . किसी भी जगह , किसी भी समय आपको मिल जायेंगे . येफास्टफ़ूडहोटल में, रेस्तरां में , बाज़ार में , थाले पर, गली में , नुकड़ पर और घर में भी ------है मजेदार-----ये फास्ट-फ़ूड.

एक ज़माना था जब घर की महिलाये दिन का ज्यादातर समय कित्चें में ही बिताती थी . उनके हाथो से, साड़ी से मस्सलो की महक आती रहती थी. आज माँ भी खुश और हम भी खुश . माँ को रसोई में जान नही पड़ता और हमें भी उस पारंपरिक खाने से छुटकारा मिला .

आज महिलाये रसोई को छोड़ आगे बाद चुकी है . आज उनके हाथ में बेलन और कद्ची नही. उनके हाथ में पुस्तके है. , फाइल है , यहाँ तक की तीर है , तलवार है .आज उनका जीवन इस फास्ट-फ़ूड से और भी आसन हो गया है . हमारा भी , इसका भी , उनका भी , उसका भी , तुम्हारा भी ------है ---

शायद यह देखकर कवि ने कहा है
पूर्व युग- सा आज का जीवन नही लाचार,
चुक्का है दूर-द्वापर से संसार.