Monday, August 17, 2009

मानव जाती -विपक्ष

विपक्ष


तीव्र गति से की गई उन्नति प्रगति का सूचक हैधीरे-धीरे की गई उन्नति , उन्नति नही परिवर्तन कहलाती हैजो समय की गति के साथ होना निश्चित हैमानव जाती ने जब परिवर्तन का बीडा उठाया है अपने को उन्नति के शिखर पर पहुचाया हैयह उसकी सोच और कर्मठता का ही परिणाम हैतीव्र गति से ही उन्नति की जा सकती है क्योकि धीरे-धीरे की गई उन्नति से उसमे अवनति के तत्व अपने पैर फैला लेते हैयह मनो- वज्ञानिक सत्य है की मानव उन्नति की और उतनी जल्दी अग्रसर नही होता जितनी जल्दी अवनति की औरसमय भी धीरे नही चलता वह निरंतर आगे बढता रहता हैसमय के साथ चलना उन्नति हैआज मनुष्य की आयु इतनी कम है की वेह सोच -विचारों में समय बरबाद नही कर सकता

किसी भी कार्य की इद्दा इस बात में नही है की वेह कितनी देर में हुआबल्कि इसमे की वेह कितनी जल्दी हुआ . तीव्र गति से उन्नति पतन का कारण नहीपतन है मनुष्य की सोच . मनुष्य भोतिक वाद की और बाद गया है . उसने नैतिक मूल्यों का त्याग कर दिया है . और यही उसके पतन का करना है . ओशो ने कहा हैभोतिक सुख का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह है की वेह अनिवार्य रूप से विवाद की और ले जाता हैयही मानव जाती के विनाश के कारन है

मनुष्य ने विज्ञानं से, विद्युत से , और उर्जा से कितनी प्रगति की हैकिसी से छुपी नहीये मानव जाती के लिए वरदान हैविनाश के लिए उतरदायी है - मनुष्य की स्वार्थो और भोग लिप्सा की प्रविर्तिया , दुसरो के अधिकारों के हनन की आदत, अंहकार की भावना , और अकर्म्दयताये प्रविर्तिया विनाश के कारन हैइन्हे बढावा देती है -सत्ता और सम्पन्त्तासता और सम्पन्त्ता उस पानी के सामान होती है जो नौका के बहार रहता है तो नौका को शक्ति पर्दान करता है और उसके तैरने का साधन बनता है किंतु जब यही पानी नौका के अन्दर जाए तो नौका के डूबने का कारन भी बनता है

प्रगति से तो मनुष्य ने प्रकर्ति और अलौकिक सत्ता के रहस्यों से भी परदा उठा दिया हैइसे हम मानव जाती का विनाश नही उन्नति कहेंगे

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